दुःख – रोग का मूल-Sadness – Origin of Disease

दुःख – रोग का मूल

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          जीवन में सुख-दुःख आते जाते रहते हैं। दुःख के कारण व्यक्ति में चिन्ता, तनाव, निराशा, भय, अधीरता, नकारात्मक सोच, चिड़चिड़ापन, घबराहट आदि संवेदनाओं के लक्षण प्रकट होने लगते हैं । परिणाम स्वरूप शरीर को ऊर्जा देने वाले ऊर्जा चक्र तथा हारमोन्स बनाने वाली अन्त:स्रावी ग्रन्थियों की कार्य-प्रणाली एवं अन्य अवयव बनाने वाली शारीरिक क्रियाएँ अस्तव्यस्त होने लगती हैं। श्वसन-तन्त्र, पाचन-तन्र, नाड़ी-तनत्र, अस्थि-तन्त्र, रक्त परिभ्रमण-तन्त्र, विजातीय तत्त्वों के विसर्जन में सहयोगी अंगों की कार्य प्रणाली आदि प्रभावित होने लगती है शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होने लगती है । नवीन कोशिकाओं का सर्जन घट जाता है । फलत: शरीर में आवश्यक अवयवों का निर्माण बराबर नहीं हो पाता | प्राण ऊर्जा का प्रवाह असन्तुलित होने लगता है, जिससे कुछ अंग आवश्यकता से ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं तो इसके विपरीत कुछ अंगों की सक्रियता घटने लग जाती है अथवा वे निष्क्रिय होने लगते हैं। शरीर में सभी अंगों का आपसी तालमेल बिगड़ने लगता है तथा सभी अंग लयबद्ध दंग से कार्य नहीं करते – यही तो रोग होता है । परन्तु आज के चिकित्सकों के पास दु:ख के इन कारणों को दूर करने की कोई दवा और उपचार नहीं है। अतः रोग के मूल कारण की उपेक्षा कर व्यक्ति को स्वस्थ रखने अथवा करने का दावा कितन अव्यावहारिक, अपूर्ण और अविश्वसनीय है, जिस पर प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी को सम्यक्‌ चिन्तन करना चाहिए चिकित्सा के क्षेत्र में लम्बे चौड़े दावों के बावजूद दुःख जो रोग का मूल है, तनाव, भय, निराशा, घबराहट आदि जो रोग के कारणों के जनक हैं, उनको मांपने , समझने और दूर करने का सर्वपरान्य उपाय तक का फ्ता नहीं। ऐसे उपचार का लक्ष्य रोग में राहत दिलाने तक ही सीमित होता है-पूर्ण स्वस्थता का नहीं हो सकता।दुख का कारण है नाशवान वस्तुएँ जिनका निश्चित वियोग होने वाला है, उनके प्रति बन्चन, आकर्षण अथवा राग भाव। बन्धन मुख्यतः तीन प्रकार का होता है| प्रथम अपने शरीर के प्रति, दूसरा स्नेही परिजन जिन्हें हम अपना समझ रहे हैं। तीसरा धन, सम्पदा, पद प्रतिष्ठा, वस्तुएँ जिन्हें हमने स्थायी रूप से अपना मान लिया है | हमारा समस्त प्रयास इन तोनों की अनुकूलताओं को सदैव बनाएँ रखने का होता है । हमारी सदैव यही भावना और कामना
रहती है कि हमारा शरीर सर्देव स्वस्थ, सुन्दर शक्तिशाली और रोगमुक्त रहे। परिजनों का वियोग न हो । वे सदैव स्वस्थ रहें तथा धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि हो । हम सदैव यही भावना रखते हैं कि जैसा मै चाहता हूँ वैसा ही हो। जो मैं नहीं चाहता, जो हमारे प्रतिकूल है , वैसा हमारे जीवन में घटित न हो। परन्तु प्राय: जैसा हम चाहते हैं, वैसा हमेशा होता नहीं। जैसा होता है वह हमेशा अच्छा लगता नहीं। जो हमें अच्छा लगता है, प्राय: सदैव रहता नहीं । ऐसा प्रकृति का सनातन नियम है। अधिकांश व्यक्तियों के जीवन में रोग, वियोग, वृद्धावस्था और मृत्यु का दुःख प्राय: आता हीं है। 

          दुःख का मूल होता है-राग और द्वेष का होना । प्रियजनों के संयोग में सुख का अनुभव करने बाला , उनके वियोग में दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। अनुकूलताओं में हर्षित होने वालों, खुशियाँ मनाने वालों को प्रतिकूलताओं के दुःख में व्याकुल होना स्वाभाविक होता है। लाभ,मान, प्रतिष्ठा में झूपनेवाला, हानि तथा पद, प्रतिष्ठा के चले जाने पर परेशान हुए बिना नहीं रह सकता। वियोग ,प्रतिकूलता और हानि में जो निमित बनेंगे, उनके प्रति समभाव रखने वाला, वियोग एवं प्रतिकूलताओं को सहजता से सहन करने के कारण अपेक्षाकृत कम दुःखी होगा। दु:ख के कारण स्वयं में खोजेगा।

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          राग और द्वेष न करना, समभाव में रहना, व्यक्ति के स्वयं के नियन्त्रण में होता है। अत: जो समभाव में रहता है वह अपेक्षाकृत कम भयभीत, तनावग्रस्त, अधीर, निराश अथवा रोग-ग्रस्त होगा अर्थात्‌ स्वस्थ जीवन जीने वाला होगा। जितनी ज्यादा समता,उतनी ज्यादा शान्ति और समाधि का अनुभव करेगा। अत: अस्वस्थता का एक मुख्य कारण हमारा राग, द्वेष के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण का होना है । जिस प्रकार रंगीन चश्मा पहने व्यक्ति को सभी पदार्थ उसी रंग के दिखाई देते हैं, वास्तविक रंग में नहीं दिखाई देते, ठीक उसी प्रकार जब तक राग-द्वेष का भाव रहेगा तब तक व्यक्ति सभी परिस्थितियों, वातावरण रिश्तोंअनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं का आंकलन सही ढंग से नहीं कर सकता है। जिसका परिणाम होता है कभी-कभी बिना कारण दु:ख, चिन्ता, तनाव भय आदि | अत: स्वस्थ जीवन जीने हेतु हमें समता, सन्तुलन का पालन करना होगा तथा विधमता और असन्तुलन पैदा करने वाले कारणों से यथा संभव बचना होगा। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति तो प्राय: जन साधारण के लिये संभव हो सकती है, परन्तु संतोष के अभाव में तृष्णा के कारण सभी कामनाओं की पूर्ति लगभग असम्भव होती है । कामनाओं की पूर्ति न होना भी दुःख का दूसरा मूल कारण होता है । अत: हम यथासंभव अनावश्यक कामनाओं से बचें । सम्यक्‌ पुरुषार्ध से जो कुछ उपलब्ध है, उसका सदुपयोग कर प्रसन रहें । 


असयमित जीवन शैली – Uneven lifestyle

         
uneven lifestyle

          प्रत्येक व्यक्ति जीवन पर्यन्त स्वस्थ एवं सुखी रहना चाहता है। स्वस्थ रहना जीव की स्वाभाविक सम्पदा है । आत्मा का स्वभाव भी है। कोई भी व्यक्ति रोगी बनना नहीं चाहता। परन्तु चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य, शान्ति और समाधि नहीं मिल सकती । स्वस्थ रहने की कामना रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उन सभी कारणों से बचना चाहिए जो उनका स्वास्थ्य बिगाड़ते हैं। हमे मानव जीवन में पर्याप्तियों के रूप में आहार , शरीर, इद्धियाँ , श्वास लेने की शक्ति, वाणी के रूप में भाषा और मन आदि ऊर्जा के जो मूल स्रोत प्राप्त हुए हैं, उनका उपयोग करते समय हमें संयम रखना चाहिए। उनकी क्षमताओं का अधिक से अधिक सम्यक्‌ उपयोग करना चाहिए । परन्तु कभी भी अनावश्यक दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साथ में वर्तमान में उपस्थित उन कारणों को दूर करने के लिए सम्यक्‌ पुरुषार्थ करना चाहिए, जिसके कारण व्यक्ति रोगी अथवा विकारों से ग्रस्त बना हुआ है | सुखी जीवन के लिए सिर्फ शरीर का होना ही काफी नहीं होता, अपितु शरीर का स्वस्थ, नीरोग और बलवान होना भी आवश्यक है । अनेक व्यक्ति बाह्य रूप से बलिष्ठ, पहलवान जैसे दिखने के बावजूद कभी कभी असाध्य रोगों से पीड़ित पाए जाते हैं, जबकि इसके विपरीत कभी -कभी बाह्य दृष्टि से दुबले-पतले दिखने वाले कुछ व्यक्ति मोटे-ताजे दिखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ज्यादा मनोबली, आत्मवली और स्वस्थ हो सकते हैं। 
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          अपनी आदतों की दासता के कारण हम अप्राकृतिक जीवनशैली की बुराईयों को जानते, मानते, स्वीकारते हुए भी छोड़ना नहीं चाहते । हमारी असजगता, अविवेक, उदासीनता, निष्क्रियता, स्वच्छन्दता, अनियमितता, अज्ञानता, सम्बक्‌ आचरण के प्रति उपेक्षावृति, हानिकारक प्रवृत्तियों के प्रति लगाव, अनुमोदन या तटस्थता अर्थात्‌ जैसा चलता है चलने दें, यह मनोवृत्ति अस्वस्थता का मुख्य कारण होती है। अतः स्वस्थ रहने की कामना करने वालों को अपनी जीवन-धर्या का निर्वाह करते समय अपनी क्षमताओं का सजगता, स्वविवेक (self conscience), संयम(Control) और सन्तुलन (Equilibrium) के साथ सम्यक्‌ (The right) पालन करना चाहिए। 

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रोग क्यों ? – why disease

रोग क्यो ?- Why disease

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          स्वस्थता के बारे मे जानने के बाद भी , हम चाहते हुए भी, हम स्वस्थ क्यो नहीं होते ? इसी लिए उन सभी कारणो को जानना जरूरी है जो हमे रोगी बनाने मे सहायक है । रोग होने के अनेक कारण होते है । जैसे पूर्व जन्म के संचित कर्मो का उदय, वंशानुगत रोग, आकस्मित दुर्घटनाए, आसपास का बाह्य प्रदूषित वातावरण, मौसम का परिवर्तन ओर उसके विपरीत आचरण, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक कुरीतियो का पालन, स्वास्थय विरोधी सरकारी नीतिया, कानून,सुविधाएँ, प्रोत्साहन, स्वास्थ को बिगाड़ने वाले रूढ़िवादी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन, जीवन निर्वाह हेतु स्वास्थ्य विरोधी व्यावसायिक वातावरण, आर्थिक मुशकेली, अपव्यय, बदनामी, प्राकृतिक अपदाओका प्रकोप, असंयम, दुर्व्यसोनो का सेवन, मिलावट एवम रसायनिक खाध ओर कीटनाशक दवाए से प्रभावित उपलब्ध आहार सामग्री, संक्रामक रोगो मे प्रारम्भ मे रखी गई उपेक्षावृति, अनावश्यक दवाए का सेवन, प्राण ऊर्जा का अपवय, आराम, निंद्रा, विश्राम का अभाव, क्षमता से ज्यादा काम करना, मल-मूत्र को रोकना, अति भोजन, अति निंद्रा, शरीर मे रोग प्रतिकारक शक्ति का क्षीण होना, गलत अथवा अधूरे इलाज तथा दवाओ का दुष्प्रभाव, वृद्धावस्था के कारण इंद्रियो का शिथिल हो जाना, प्रमाद, आलस्य, अविवेक, अशुभ चिंतन, आवेग, अज्ञान, असजगता, हिंसक, मायावी, अनैतिक जीवन शैली, जिससे सदेव तनावग्रस्त ओर भयभीत रहने की परिस्थितिया बनना आदि रोग के मुख्य कारण होते है ।

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          कुश कारण तो हमारे नियंत्रण मे होते है कुश कारण नहीं। फिर भी हमारी आत्मा मे अनंत शक्ति होने से यदि सजगता ओर स्वविवेक पूर्ण जीवन शैली अपनायी जाए तो,जो रोग के कारण हमारे नियंत्रण मे नहीं है, उनके प्रभाव को भी कम किया जा सकता है । जीवन मे सभी को सदैव सभी प्रकार की अनुकूलता नहीं मिलती । प्रतिकूल परिस्थितियो को स्वस्थ चिंतन, मनन ओर सम्यक आचरण द्वारा अपने अनुकूल बनाया जा सकता है, यही स्वास्थ्य का मूल सिद्धान्त ओर स्वस्थ जीवन की आधारशिला होती है । हमारा चिंतन ओर आचरण जितना जितना सम्यक होगा, उतने उतने हम स्वस्थ होते जायेंगे ।




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स्वयं सजगता स्वास्थ्य के लिए -self awareness for health

स्वास्थ्य के लिए हलकापन – lightness for health

LIGHTNESS FOR HEALTH-स्वास्थ्य के लिए हलकापन


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          सरलता ओर हलकापन स्वास्थ्य का प्रथम लक्षण है । अस्वस्थता से पहले हमे शरीर मे भारीपन का अनुभव होने लगता है । बैचेनी ओर अटपटा लगने लगाता है । जैसे ही हलकापन का अनुभव करने लगते है , हम स्वस्थता का अनुभव करने लगते है । जब हमारे संस्कारो ओर वृति मे निष्कपटता आने लगती है, हम अपने आपको निर्भय, तनाव मुक्त ओर हल्का अनुभव करने लगते है । भारीपन क्यों, कब ओर कैसे आता है ? उसके समझे बिना तथा उन कारणो से बचे बिना हलकेपन की प्राप्ति कठिनहोती है ।

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          हम जो कार्य करते है उसका उतना भार नहीं होता, जितना भार होता है उस कार्य की स्मृति अथवा कल्पना का । वर्तमान का क्षण बहुत पवित्र होता है । अगर यदि भूतकाल की याद ओर भविष्य की कल्पना न की जाए तो मानसिक असंतुलन के दोषो से सहज ही बचा जा सकता है कहा भी है – भूत सपना है, भविष्य कल्पना है, ओर वर्तमान अपना है ।“ दुख: की याद ओर कल्पना का अनावश्यक चिंतन भी मानसिक भारीपन का प्रमुख कारण होता है । अगर वर्तमान मे सहज जीना सीख ले तो हमारी अनेक समस्याओ का समाधान सहज संभव हो जाता है ।

                           What you eat today that will define your health condition.

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स्वयं सजगता स्वास्थ्य के लिए -self awareness for health

SELF AWARENESS FOR HEALTH-
स्वयं सजगता स्वास्थ्य के लिए 
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एक  व्यक्ति ने अपने पड़ौसी  से कहा, आप मेरे घर की शूरक्षा का ख्याल रखना । पड़ौसी ने उसको पूछा – आप अपने मकान की शूरक्षा का भार हम पर क्यू डाल रहे हों ? क्या आप घर से कही बाहर जा रहे हों ? व्यक्ति ने कहा – नहीं ओर सहजता से जवाब दिया “ मे घर मे ही आराम कर रहा हु , मेरी निंद्रा मे बाधा उत्पन ना हों , इसी कारण आपके सहयोग की अपेक्षा हे ।“ क्या एसे व्यक्ति की बात पड़ौसी हमेशा स्वीकार करेंगे ? क्या एसे व्यक्ति को हम असजग,आलसी  अथवा निष्क्रिय  तो नहीं कहते । अपने स्वास्थ के बारे मे ज्यादा तर लोगो की स्थिति एसी ही हे ।
          आज के समय मे लोग health check-up के समय, treatment ओर उसके side effect  के बारे मे जरा सा भी चोस  ते नहीं है । रोग का कारण जाने बिना treatment चालू कर देते है । आज एक  treatment कल दूसरा treatment ,आज ए doctor कल दूसरा doctor परसो अन्य doctor ,आज ए hospital कभी दूसरा hospital ,आज एक treatment process थोड़े दिन बाद दूसरी treatment process ,ओर रोग मुक्त न होने पर बहुत ज्यादा treatment बदल मे थोड़ा सा भी संकोस नहीं होता । स्वयं की असजगता ,अविवेक ओर सही चिंतन न होने पर हमारी  सोच लुभावने विज्ञापनो , doctor के पास पड़ने वाली भीड़ से प्रभावित होती है। हम निराश होकर doctor की प्रयोगशाला बन मे थोड़ा सा भी विचार नहीं कर ते । आज अधिंकाश असाध्य ओर संक्रामक रोगो का एक मुख्य कारण , starting level मे ही गलत treatment से होने वाले side effect होते है । जिसकी तरफ सायद किसी का ध्यान जा रहा है ।

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          क्या हमारा श्वास अन्य व्यक्ति ले सकता हे ? क्या हमारा खाया हुआ अन्य कोई पचा सकता हे ? क्या दूसरो के  से खाने ओर पीने से हमारी भूख ओर प्यास मीट सकती हे ? दूसर के आंखो से हम देख नहीं सकते , दूसरे के कान से हम सुन नहीं सकते , दूसरो  के पैरो से चल नहीं सकते । अपने स्वयं की गतिविधियो के संचालन, नियंत्रण से जीतने हम परिचित होते हे, उतना दूसरा कोई नहीं होता । हम क्यो तनाव-ग्रस्त,चिंतित,निराश  भयभीत हे ? उनका सही विश्लेषण दूसरा व्यक्ति या यंत्र नहीं कर सकता । हम स्वयं अपने खान–पीने, रहन-सहन, आसार-विचार ओर गलत जीवन चर्या के अप्राकृतिक तरीको से रोगो को आमंत्रित कर ते हे, पर दवा ओर डॉक्टर से पूर्ण स्वस्थय की आशा रखते हे । कितना भ्रम है ? डॉक्टर ओर दवा मात्र सहयोग की भूमिका निभा सकते है । स्वस्थय को बनाए रखने मे स्वयं की सजगता जरूरी हे । मानसिक असंतुलन ओर रोग का आभास होने पर रोगिकों पिसले एक-दो दिन की गतिविधियो की समीक्षा करनी सहीए । हमे अपने आप अपनी गलती का पता लग जाएगा, जिसके कारण रोग हुआ हे । रोग की प्रारंभिक स्थिति मे ही जो संकेत मिलते हे उनकी समीक्षा करे ,ओर हवा ,पानी ओर भोजन लेने मे जो गलती हुई हे उनको सुधारे । कारण मालूम पड़ने पर उपाय ढूँढना आसान हो जाएगा । स्वस्थ रहेकी ईशा रखने वाले कों हर रोज खुदकी समीक्षा करनी चाहिए ।

All diseases are curable but not all patients because they are very much impatience

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स्वास्थ्य के लिए हलकापन – lightness for health

स्वास्थ्य क्या है – what is health ?

स्वास्थ्य क्या हे ?

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स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तो का अध्यन करने से पूर्व स्वास्थय  क्या होता हे ? उनको जानना ओर समजना बहुत जरूरी हे। ताकि स्वास्थ्य के अनुसार जीवनशैली अपनाई जा सके, ओर रोगो के कारणो से यथा सम्भव बचा जा सके । 
कभी-कभी बहुत छोटी लगने वाली हमारी गलती भविष्य मे रोग का बहुत बड़ा कारण बन जीवन की खुशी ओर आनंद हमेशा के लिए खतम कर देता हे। 

स्वस्थ कोन ?

who is healthy?

what is health

स्वस्थ का मतलब होता हे  रोग -मुक्त जीवन। स्वस्थता तन,मन ओर आत्मोत्साह के समन्वय का नाम हे। जब शरीर,मन, इंद्रिया ओर आत्मा ताल–से ताल मिला कर सन्तुलन से कार्य करते हे, तब ही अच्छा  स्वास्थ्य  कहलाता हे । मतलब शरीर की पूरी प्रणालीया ओर सभी अवयव स्वतंत्र अपना–अपना कार्य करे , किसि के भी कार्य मे, किसी भी प्रकार का अवरोध ,आलस्य अथवा निष्क्रियता न हो ओर उनको चलाने के लिए किसी भी उपकरण तथा दवा की जरूरत न हो । मन ओर पंचो इंद्रियो सशक्त हो। याद शक्ति अच्छी हो। विवेक जागृत हो। लक्ष्य सही हो ओर जीवन मे आनंद ,शांति ओर प्रशान्ता बढ़ाने वाला हो,ना की तनाव,चिन्ता, निराशा,भय, अनैतिकता , हिंसा , जुठ , चोरी , व्यभिचार , आदि दुःख जे से कारणो को बढ़ा ने वाला। प्राथमिकताए सही हो ओर उसके अनुरूप सयमित ,नियमित ओर नियंत्रित जीवन चर्या हो। मन बेचैन न हो। इंद्रियो की विषय–विकारो मे आसक्ति न हो। सभी प्रवृतीय सहज ओर स्वाभाविक हो, अस्वाभाविक न हो मतलब जिसका पाचन ओर श्वसन बराबर हो ,नियमित हो ,संतुलित हो। अनावश्यक विजातीय तत्वो का शरीर से निकल ना सही हो। भूख प्राकृतिक लगती हो। नींद स्वाभाविक आती हो। पसीना गंध हिन हो। त्वचा मुलायम हो , बदन गठीला हो। आंखो मे तेज ,खिला हुआ चेहरा हो ओर कमर सीधी हो। नाड़ी ,मज्जा ,अस्थि, प्रजनन, रक्त प्ररिभ्रमन आदि तंत्र शक्ति शाली हो ओर अपना कार्य क्षमता से करने मे योग्य हो। जो निरहंकारि  हो। जो आत्मविश्वासी हो , दढ़ मनोबली ,सहनशील , धैर्यवान , निर्भय , साहसी  ओर जीवन के प्रति उत्साही हो। जिसके सभी कार्य समय पर होते हो तथा जीवन नियमब्ध हो । सहि मे सभी स्वस्थता के मापदंड तो यही हे। जीतने – जीतने अंशो मे उपरोक्त तथ्यो की प्राप्ति होती हे उसिके अनुसार मे व्यक्ति  स्वस्थ होता हे । इसके विपरीत स्थिति पेदा होने पर अपने आपको स्वस्थ मानना तथा दावा करना न्याय संगत नहीं हो सकता। हरेक व्यक्ति को अपनी स्थिति के बारे मे अवश्य चिंतन करना चाहिए। जो – जो बाते अपने स्वयं के नियंत्रण मे हो , उसके अनुरूप जीवनशैली अपनानी चाहिए। 
what is health

परंतु आज के समय मे स्वस्थ की बात करते ओर सलाह देते समय कोई भी doctor या health expert स्वास्थ को प्रभावित कर ने वाले उपरोक्त बाते को सही से विश्लेषण नहीं करते।
          जो भी यंत्रो ओर परीक्षणों से पता लगाया जाता हे ,वो केसे सत्य ओर पूर्ण हो सकता हे । स्वस्थ रहने हेतु व्यक्ति अपनी सजगता,विवेक,बुद्धि ओर स्वयं की स्वयं द्वारा समीक्षा,स्वस्था के लिए जरूरी हे। पराधीन ,अर्थात दूसरों पर आश्रित रहेने वाला व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता।

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स्वयं सजगता स्वास्थ्य के लिए -self awareness for health

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