प्रत्येक व्यक्ति जीवन पर्यन्त स्वस्थ एवं सुखी रहना चाहता है। स्वस्थ रहना जीव की स्वाभाविक सम्पदा है । आत्मा का स्वभाव भी है। कोई भी व्यक्ति रोगी बनना नहीं चाहता। परन्तु चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य, शान्ति और समाधि नहीं मिल सकती । स्वस्थ रहने की कामना रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उन सभी कारणों से बचना चाहिए जो उनका स्वास्थ्य बिगाड़ते हैं। हमे मानव जीवन में पर्याप्तियों के रूप में आहार , शरीर, इद्धियाँ , श्वास लेने की शक्ति, वाणी के रूप में भाषा और मन आदि ऊर्जा के जो मूल स्रोत प्राप्त हुए हैं, उनका उपयोग करते समय हमें संयम रखना चाहिए। उनकी क्षमताओं का अधिक से अधिक सम्यक् उपयोग करना चाहिए । परन्तु कभी भी अनावश्यक दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साथ में वर्तमान में उपस्थित उन कारणों को दूर करने के लिए सम्यक् पुरुषार्थ करना चाहिए, जिसके कारण व्यक्ति रोगी अथवा विकारों से ग्रस्त बना हुआ है | सुखी जीवन के लिए सिर्फ शरीर का होना ही काफी नहीं होता, अपितु शरीर का स्वस्थ, नीरोग और बलवान होना भी आवश्यक है । अनेक व्यक्ति बाह्य रूप से बलिष्ठ, पहलवान जैसे दिखने के बावजूद कभी कभी असाध्य रोगों से पीड़ित पाए जाते हैं, जबकि इसके विपरीत कभी -कभी बाह्य दृष्टि से दुबले-पतले दिखने वाले कुछ व्यक्ति मोटे-ताजे दिखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ज्यादा मनोबली, आत्मवली और स्वस्थ हो सकते हैं।
अपनी आदतों की दासता के कारण हम अप्राकृतिक जीवनशैली की बुराईयों को जानते, मानते, स्वीकारते हुए भी छोड़ना नहीं चाहते । हमारी असजगता, अविवेक, उदासीनता, निष्क्रियता, स्वच्छन्दता, अनियमितता, अज्ञानता, सम्बक् आचरण के प्रति उपेक्षावृति, हानिकारक प्रवृत्तियों के प्रति लगाव, अनुमोदन या तटस्थता अर्थात् जैसा चलता है चलने दें, यह मनोवृत्ति अस्वस्थता का मुख्य कारण होती है। अतः स्वस्थ रहने की कामना करने वालों को अपनी जीवन-धर्या का निर्वाह करते समय अपनी क्षमताओं का सजगता, स्वविवेक (self conscience), संयम(Control) और सन्तुलन (Equilibrium) के साथ सम्यक् (The right) पालन करना चाहिए।
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