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अनिद्रा

अनिद्रा क्या है ? WHAT IS INSOMNIA IN HINDI

          आज इस भागदौड़ भरी जिंदगी से लोग थक जाते है। इस थकान को मिटाने के लिए अच्छी नींद की जरूरत होती है। लेकिन आज के समय में हर किसी को अच्छी नींद नहीं आती है। क्या ? आपको भी अच्छी अच्छी नींद नहीं आती ? तो कहीं आपको अनिद्रा का रोग नहीं हो गया ना ?

          अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग ने बताया कि अमेरिका में हर साल 64 मिलियन लोग स्लीप इनसोमनिया  से पीड़ित होते हैं।पुरुषों से ज्यादा महिलाएं 1.4 परसेंट ज्यादा पीड़ित है।

          अनिद्रा से हमें मानसिक तनाव होता है।इससे हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता हे। इस गंभीर बीमारी हो सकती हे। और जो भी पहले से हमारे शरीर में बीमारी हे उसको बढ़ावा मिलता हे। तो इस अनिद्रा को हल्का नहीं लेना चाहिए।  तो चलो हम अनिद्रा का कारण जानते हे और इस के उपाय के बारेमे जानते हे।

अनिद्रा के लक्षण

Symptoms of Insomnia in hindi

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एक चिकित्सक समूह के दिशानिर्देशों के अनुसार, अनिद्रा वाले लोगों में निम्नलिखित लक्षण एक या अधिक होते हैं:

  • सोने में कठिनाई होना

  • निरंतर निद्रा नहीं आती

  • नींद पूरी होने से पहले जल्दी जाग जाना।

  • देर रात तक नींद नहीं आना।

  • सुबह उठते ही थकान और ऊर्जा की कमी महसूस होना।

  • ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होना।

  • मूड में गड़बड़ी और चिड़चिड़ाहट।

  • व्यवहार संबंधी समस्या , जैसे कि स्वभाव में आक्रामकता आना।

  • काम के स्थल या स्कूल में कठिनाई। 

  • व्यक्तिगत सबंध में कठिनाई , जैसे की परिवार , मित्र और हमारी देखभाल काने वाले लोगो के साथ।  

    अनिद्रा के कारण

    Causes of insomnia IN HINDI

    • अधिक सोचने से। इसे मस्तिष्क में तनाव पैदा होता है।

    • व्यायाम की कमी।

    • नींद के समय सेल फोन का उपयोग करना।

    • जीवन की समस्याएं जैसे चिंता, तनाव, भावनात्मक और मानसिक तनाव, काम की समस्याएं, धन दबाव, जातीय जीवन में असंतोष।
      मानसिक विकार। 

    • कंपनी में शिफ्ट में काम करना, क्योंकि समय में लगातार बदलाव से सही समय पर नींद नहीं आती है।

    • दवा के दुरुपयोग और नींद आने की दवा के साइड इफेक्ट से।

    • मस्तिष्क की चोट और पूर्व आघात का इतिहास।

    • हार्मोन में बदलाव। जैसे कि पीरियड के पहले और मेनोपॉज के बाद।
      पैर की अस्वस्थ अवस्था में।

    • अन्य बीमारियों जैसे बहुमूत्रता , खुजली, खांसी जैसी शारीरिक बीमारियां।

    उपाय

    NEEDSTOLIFE

               मुझे लगता है कि आपको पहले स्लीप एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए।अनिद्रा की दवाई ज्याद समय नहीं लेनी साहिए।  पहले हमें नींद के एक्सपर्ट से बातसित करके हमारि अंदर का कारण पता करना चाहिए।  बाद में उस कारण को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

              आपको योग निद्रा का अभ्यास करना चाहिए। योग से नींद में बहुत लाभ होगा। इसके लिए आप योग विशेषज्ञों से मिल सकते हैं। अनिद्रा को दूर करने के लिए प्रतिदिन योग का अभ्यास करना चाहिए।  क्योकि इसके कोई साइडइफेक्ट नहीं हे।

    यह टिप्स आपके लिए। 

    • आपको बाहर की वस्तु और पैकिंग वाली वस्तु नहीं खानी है।

    • कुदरती जीवन जीना है।

    • सुबह अनुलोम विलोम प्राणायाम , भस्त्रिका प्राणायाम , भ्रामरी प्राणायाम करना हे।

    • खाना खाने के 3 घंटे बाद सोना चाहिए।

    • भोजन रात्रि को जल्दी कर लेना चाहिए।

    • रात्रि सोने से पहले स्नान करना चाहिए , इसे काफी फर्क पड़ता हे।

    • रात्रि को उत्तर दिशा में सिर रखकर न सोए।

    ऊपर दी गई टिप्स के अनुसार जीवन जिओगे तो जरूर आपके जीवन में फर्क आएगा

 

 

WHAT IS RELIGION ? – धर्म क्या हे ?

WHAT IS RELIGION ? – धर्म क्या हे ?

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                    शांति किसको नहीं साहिए सभी लोग अशांत हेबेचेन हेव्याकुल हेदुखियारे हे। किसिकों इस बात का दुख हेकिसिकों दूसरी बात का दुख हे आज एक बात का तो कल दूसरी बात का दुख  ईस तरह दुनिया के सभी लोग दुखी हे  ईस दुख दर्द से बहार केसे निकले ईस दुख से केसे  छुटकारा पाए सही मायने मे सुख ओर शांति से केसे रह सकते हे ?हमारे देश के ऋषिओमुनियोसद्गुरुओसत्पुरुषोंमहापुरुषोंबुद्धोअरहन्तोए सभीने ईस बात की शोध कीदुखो से छुटकारा  केसे मिले सही मायने मे सुख शांति केसे प्राप्त हो साभिकों एक ही परिणाम मिला की धर्म से ही सुख शांति मिल सकती हे  सही सुख ओर शांति धर्म के बिना नहीं मिल सकती  किंतु धर्म तभी सुख ओर शांति प्रदान करता हेजब हम उसको धारण करते हे  धर्म धारण करते नहीं ओर उसकी बाते करते हे ओर वादविवाद करे तो सुख ओर शांति नहीं मिलती  ईस लिए समजते हे की धर्म को केसे धारण करते हे  

आप समजते है धर्म क्या है ?-Do you understand what religion is? 

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                    देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य हे की पूरे देश मेधर्म के अर्थ को ही भूल गए हे। कहिभी धर्मसबंधित बातचर्चा होती हे तो लोगो के कान चुनने के लिए सतर्क  हो जाते हेकी   व्यक्ति किस धर्म  की बात करेंगा ? हिन्दू  धर्म या बोद्ध की , जैन धर्म या पारसी धर्म की , ईसाई धर्म या शिख धर्म की, किस धर्म की बात करेंगे ? बहुत बड़ा दुर्भाग्य हुआ हे की धर्म के साथ विशेषण लग गया हे जाने की धर्म का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं हे
                   धर्म का उसका महान अस्तित्व हे, किंतु धर्म के साथ कोई भी विशेषण लग जाता हे तो धर्म धर्म “ नहीं रहता । जिस दिन से धर्म के साथ हिन्दू लगने लगा तो हिन्दू प्रमुख होगया ओर धर्म अंधेरे मे चला गया । जिस दिन बोद्ध धर्म कहने लगे तब से ‘’बोद्ध मुख्य हो गया ओर धर्म गायब हो गया । जब से जैन धर्म कहने लगे तब से “जैन” बड़ा होगया ओर धर्म अदशय हो गया । धर्म को एसे विशेषण की जरूरत नहीं होती । धर्म कभी भी हिन्दू नहीं होता , बोद्ध, जैन, ईसाई, पारसी, मुस्लिम, के शीख नहीं होता । ए सभी लोगो के समूह हे , एक प्रकार के उत्सव बनाने वाले, व्रत- उपवास बनाने वाले , एक प्रकार की रहनी-करनी वाले, खान-पान वाले, दार्शनिक मान्यता वाले लोगो का समूह हे , संगठन हे, समुदाय हे, संप्रदाय हे। जैन , हिन्दू , पारसी , मुस्लिम , शीख ,ईसाई इत्यादि हो सकते हे , किंतु धर्म नहीं हो सकता । धर्म का इसके साथ दूर का कोई संमबंध नहीं हे। हम धर्म के नाम पर कहा भ्रमित हुए है ?

धर्म शब्द का सही मतलब ?-What does the word dharma mean?


          भारतमे ढाई हजार साल पहले धर्म शब्द की परिभाषा थी “ धारेती ति धममों “ धारण करे वो धर्म । कोन धारण करेंगा ? तो समजाया की “अतनों पन सभान्व धारेती ति धममों “ अपना स्वभाव धारण करे, अपनी विशेषता धारण करे, इस मतलब को धर्म कहते है । हमारा दुर्भाग्य हुआ की , हमारे देश से एक बहुत बड़ा धर्म का साहित्य हमारे देश से अदशय हो गया । इस के कारण हम “धर्म” शब्द का सही मतलब ही भूल गए है । इसका परंपरिक इतिहास भूली गया , अपना स्वभाव धारण करे वो धर्म – भारत की यह प्राचीन व्याख्या को , यह परिभाषा को आज भी कभी–कभी , कही-कही प्रयोग हो जाता है ।
          आज भी कहते है, अग्नि का धर्म जलना ओर जलाना हे , मतलब अग्नि का स्वभाव जलना ओर जलाना , वह स्वयं भी जलती हे ओर उसके लंपेंट मे जो भी आते हे उसको भी जलाती हे , तभी तो वह अग्नि है । यह जलता नहीं ओर जलाता नहीं तो वह कुस ओर हो सकता हे पर अग्नि नहीं । एसे कहेतों बरफ का धर्म ठंडा ओर ठंडा करना, यह इसका स्वभाव हे । इसमे हिन्दू , जैन ,ईसाई ,पारसी ,मुस्लिम ,शीख की कहा बात है ।
          आज भी कहते हे सभी प्राणी मरणधर्मा हे । मरना इसका स्वभाव हे । जो भी प्राणी जन्म लेता हे वह मरने के लिए ही जन्म लेता है । सभी प्राणी जीर्णधर्मा – सभी प्राणी जीर्ण होते ही है । सभी प्राणी व्याधिधर्मा – सभी प्राणी को कुस न कुस रोग होई जाता है । यह स्वभाव हे,यह प्रकृति हे । भारत की प्राचीन भाषामे धर्म का यही मतलब होता है- यह स्वभाव हे, यह प्रकृति का नियम हे , कुदरत का कानून हे। यही दुनिया का विधान हे। इसे ऋत कहते हे। ऋत का मतलब कानून होता हे । यह एसा होगा तो यह परिणाम होंगे , यह वह नहीं होंग तो यह परिणाम नहीं आएगा । केसी वेज्ञानिक बाते हे! इस कही हिन्दू , मुस्लिम ,जैन , शीख ,पारसी  की कही बात आई ? किंतु धर्म के बजाय संप्रदाय मे केसे भ्रमित हुए ! दार्शनिक मत-मतांतरों मे भ्रमित हुए , कर्मकांड मे भ्रमित हुए ओर एसे भ्रमित हुए की धर्म को भूल गए ।   
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          हम अपने अंदर कोई भी विकार जगाते हे – क्रोध जगाते हे , द्वेष जगाते हे , दुर्भावना जगाते हेइस लिए क्रोधका , द्वेषका ,ओर दुर्भावना का स्वभाव हे की हम व्याकुल बन जाते है । कोई भी क्रोध जगाके अनुभव कर ले वह तुरंत व्याकुल हो जाएगा । बाद मे भले ही वह स्वयं को हिन्दू कहे ,या बोद्ध , जैन , मुस्लिम ,यहूदी , ईसाई , शीख कहे उस कोई फरक नहीं पड़ता । यह धर्म हे। प्रकृतिका नियम हे , उसका स्वभाव हे । जब हम स्वयं अपने अंदर विकार जगाने लगते हे की प्रकृति हमे तुरंत दंड देना चालू कर देंगी । तुरंत सजा मिलना चालू हो जाता हे। कोई भी सही राज्ये के नियम बनते हे , वह सब लोग पर एक जैसे लागू होते है। पर जब एक जैसा नियम लागू नहीं होता तो वह सही राज्ये नहीं हो सकता । राज्ये के जो नियम तोड़ता हे तो राज्ये के तरफ से दंड मिलता है। किंतु एसा हो की राज्ये के कोई नियम तोड़े ओर राजयके अधिकारिओ पता ही ना चला तो अथवा अधिकारिओ ने देखा पर ध्यान नहीं दिया ओर कोई कार्यवाही नहीं की तो दंड नहीं मिलेगा । किंतु कुदरत के राज्य मे प्रकृति के राज्य मे अन्यथा एसा कहो परमात्मा के राज्य मे एसा नहीं चलेगा । यहा तो कोई नियम तोड़ेंगा तो दंड नहीं मिलेंगा एसा तो असंभव है।
          जोभी क्षण आप नियम तोड़ेगे तो वह तत्काल दंड को प्राप्त करेगा । जोभी क्षण मन मे विकार जगाएगे तुरंत आप परेसान होना चालू हो जाएंगेइसमे देर नहीं लगेगी । प्राचीन भाषा मे इसको सहजात कहा हेमतलब एकसाथ जन्म होना । हमारे विकार ओर दुख का एक साथ जन्म होता है। मनमे विकार जगा तुरंत व्याकुल हुआ । मनमे विकार जगा ओर सुख-शांति का अनुभव हो यह असंभव है। यह दोनों साथ मे नहीं हो सकता । विकार जगा ओर तुरंत व्याकुल हुआ क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। जो नियम तोड़ेंगा उसको दंड भुगतना ही पड़ेगा । यह ए नाम से बुलाए या वह नाम से बुलाएइसको प्रकृति नहीं देखती कीवह व्यक्ति अपने को किस नाम से बुलाता है।स्वयं को हिन्दू कहे या बोद्ध कहेब्राह्मण कहे या क्षत्रिय कहे अथवा शैव कहे या वैष्णव कहे । प्रकृति यह नहीं देखती की यह भारतीय हे या अमेरिकन ,जापानी हे या चीनी दंड तो तुरंत मिलेगा प्रकृति का यह नियम हेयह धर्म है।  
          इसी तरह अपने विकारो को शून्य करदे मतलब अपने मन को विकार विहीन निर्मल चित स्वयम का स्वभाव है। इसमे अनंत मैत्री भर जाएगीअनंत करुणा भर जाएगी अनंत समता भाव से भर जाएगी । यह इसका स्वभाव हे यह प्रकृति हेयह नियम हे यह ऋत हे। ओर जेसे ही मैत्री जागेगी करुणा जागेगी सदभावना जागेगी तुरंत आपको पुरुस्कार देना चालू हो जाएगा । आपको अंदर से शांति का अनुभव होगाओर बहुत सुख का अनुभव होगा । अब आप अपने आपको हिन्दू ,जैन ,बोद्ध ,मुस्लिमपारसी अमेरिकन ,रशियन  कुस भी फरक नहीं पड़ता । पुरुस्कार मिलना चालू हो जाएगा । जरसा चित को निर्मल करके तो देखो मैत्री भाव जगा के तो देखो करुणा भाव जगा के तो देखो सदभावना जगा के तो देखो तुरंत परिणाम मिलना चालू हो जाएगा देर नहीं लगेगी । जेसे दंड मिलने मे देर नहीं लगती वेसे ही पुरुस्कार मिलने मे देर नहीं लगती । प्राचीन भारत मे इसको धर्म कहे ते थे ।

अध्यात्मिकता क्या है ?- WHAT IS SPIRITUAL ?

Introduce Yourself (Example Post)

This is an example post, originally published as part of Blogging University. Enroll in one of our ten programs, and start your blog right.

You’re going to publish a post today. Don’t worry about how your blog looks. Don’t worry if you haven’t given it a name yet, or you’re feeling overwhelmed. Just click the “New Post” button, and tell us why you’re here.

Why do this?

  • Because it gives new readers context. What are you about? Why should they read your blog?
  • Because it will help you focus you own ideas about your blog and what you’d like to do with it.

The post can be short or long, a personal intro to your life or a bloggy mission statement, a manifesto for the future or a simple outline of your the types of things you hope to publish.

To help you get started, here are a few questions:

  • Why are you blogging publicly, rather than keeping a personal journal?
  • What topics do you think you’ll write about?
  • Who would you love to connect with via your blog?
  • If you blog successfully throughout the next year, what would you hope to have accomplished?

You’re not locked into any of this; one of the wonderful things about blogs is how they constantly evolve as we learn, grow, and interact with one another — but it’s good to know where and why you started, and articulating your goals may just give you a few other post ideas.

Can’t think how to get started? Just write the first thing that pops into your head. Anne Lamott, author of a book on writing we love, says that you need to give yourself permission to write a “crappy first draft”. Anne makes a great point — just start writing, and worry about editing it later.

When you’re ready to publish, give your post three to five tags that describe your blog’s focus — writing, photography, fiction, parenting, food, cars, movies, sports, whatever. These tags will help others who care about your topics find you in the Reader. Make sure one of the tags is “zerotohero,” so other new bloggers can find you, too.

पंचमहाभूत तत्व

पंचमहाभूत तत्व

       भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार पंच महाभूतों तत्व की अहं भूमिका है ।  यह पंच महाभूतों (1) पृथ्वी (2) जल (3) अग्नि (4)वायु (5) आकाश । यह हमारा शरीर पंच महाभूत तत्व से बना है। हमारा स्वस्थ होने ओर बीमार होने मे यह पंच महाभूत तत्व का असंतुलन जींमेदार होता है। यह पंच महाभूत तत्व के असंतुलन से ही हमारे शरीर मे बीमारी आती है ।यह पंच महाभूत तत्व से ही हमारे ऊपर ग्रहो का कम या ज्यादा प्रभाव पड़ता है। यह तत्व हरेक मनुष्य मे अलग अलग मात्रा मे होता है। किसी मनुष्य मे कम तो किसी मनुष्य मे ज्यादा होता है। ओर इसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। तो हम यहा जानने की कोशिस करेंगे की किन तत्व के असंतुलन से हमारे शरीर के कोनसे भाग मे क्या असर करता है।

(1) पृथ्वी – Earth

NEEDS TO LIFE
NEEDS TO LIFE

       सभी पंचो तत्व मे से पृथ्वी तत्व सब से भारी होता है । पृथ्वी तत्व कठोर होता है। तो हमारे शरीर मे जो भी कठोर भाग है उसमे पृथ्वी तत्व का प्रमाण ज्यादा होता है। जेसे की पैर,हड्डी, त्वचा नाखून ओर बाल इत्यादि।शरीर मे पैर मे नीचे से लेकर कमर तक पृथ्वी तत्व का प्रभाव ज्यादा रहेता है। पैर संमबंधित बीमारी मे पृथ्वी तत्व का असंतुलन जींमेदार होता है। पृत्वी तत्व के कमी के कारण शरीर दुर्बल ओर कमजोर होजता है ओर ज्यादा होने से मोटापा होता है।

            इस के असंतुलन से शरीर मे जड़ता बढ़ती है । ओर निर्णय लेनि की क्षमता कम विकसित होती हे, इस मन की एकाग्रता कम होती है । जिनमे सूंघ ने की क्षमता ज्यादा होती है उनमे पृथ्वी तत्व अधिक मात्रा मे होता है । मन मे दया ओर कोमलता का भाव, जोखिम उठाने की क्षमता ओर सर मे भारीपन यह सब पृथ्वी तत्व से संमबंधित होता है।

            आयुर्वेदिक पद्धति से माटी उपसार ओर प्राकृतिक चिकित्सा से आहार मे सुधार करने से पृथ्वी तत्व के असंतुलन को दूर किया जा सकता है।

(2) जल – water 

NEEDS TO LIFE
NEEDS TO LIFE

 

            पंच तत्व मे जल तत्व पृथ्वी तत्व से हलका ओर प्रवाही होता है। इसलिए धरती पर जल रहता हे ओर पृथ्वी उसका आधार होती है। ओर उसका प्रवाह हमेशा नीचे की तरफ रहता है। शरीर मे जल तत्व का भाग गुदा मार्ग से नाभी तक अधिक होता है । हमारे शरीर के अंदर जोभी प्रवाही होते है जैसे की रक्त, वीर्य, मल, मूत्र, कफ, थूक, पसीना, मज्जा आदि का संबन्ध जल तत्व से ज्यादा होता है।

            जल तत्व भी हमारे शरीर मे सही मात्रा मे जरूरी होता है, वरना समस्या हो सकती है ।जल तत्व की कमी से जैसे की शरीर मै शुष्कता, त्वचा की समस्या, बालो का समय से पहले सफेद होना, प्यास ज्यादा लगाना जैसी समस्या होने लगती है। परंतु जल तत्व की अधिकता बढ़ने से कफ का बढ़ाना, पसीना ज्यादा आना, पेशाब ज्यादा लगाना जैसी स्थिति बनती है। शरीर मे जल तत्व की अधिकता वाले मन से ज्यादा भावुक ओर आसक्ति रखने वाले होते है। शरीर मे आलस्य ज्यादा होती है ओर निद्रा भी अधिक आती है।

            उषापान, बास्प स्नान, टब बाथ, एनीमा, नेति जैसी अन्य जल सबंधित क्रिया द्वारा शरीर मे जल तत्व का संतुलन कर सकते है

(3) अग्नि – FIRE 

NEEDS TO LIFE
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       पंच महाभूत तत्व मे अग्नि तत्व एक ऊर्जा स्वरूप है। अग्नि तत्व जल तत्व से भी हल्का होता है। अग्नि तत्व का स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। हमारे शरीर मे अग्नि तत्व का भाग नाभि से हदय तक होता है। शरीर मे नाभि वाला भाग जल तत्व ओर अग्नि तत्व से प्रभावित होता है। जोश, उतेजना, स्फूर्ति, शरीर की उषणता आदि का सबंध अग्नि तत्व से होता है।

            हमारे शरीर मे अग्नि तत्व के कमी के कारण भूख ओर प्यास कम लगना, स्वभाव मे चिड़चिड़ापन आजाता है, शरीर की शक्ति मे बदलाव आजाता है, आखों की रोशनी कम होने लगती है, पाचन कम होने लगता है, प्रजनन रोगो की संभावना बढ़ जाती है, चर्म रोग ओर जोड़ो का दर्द होने लगता है।

            शरीर मे अग्नि तत्व की अधिकता से पित बढ़ाना, बुखार आना, शरीर जलना, भूख ओर प्यास अधिक लगना, क्रोध ज्यादा आना, भोग की इषा होना आदि जैसे लक्षण पाये जाते है।

            सन बाथ, सूर्य प्राणायाम ओर व्यायाम से शरीर मे अग्नि तत्व बढ़ता है। ओर आराम, अधिक निद्रा ओर चंद्र प्राणायाम से शरीर मे अग्नि तत्व कम होता है। इस तरह हम अग्नि तत्व को संतुलित कर सकते है।

(4) वायु – AIR

            हमारे शरीर मे वायु तत्व भी रहता है, ओर वायु तत्व अग्नि तत्व से भी हल्का होता है । इसलिए शरीर के ऊपर भाग मे इसकी अधिकता होती है। शरीर मे वायु तत्व का भाग हदय से कंठ तक अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। वायु तत्व अस्थिर होता है। इसलिए शरीर मे हलन चलन, चंकोसन ओर फैलने वाली गतिविधियो मे इसकी अधिक भूमिका होती है।

            हमारे शरीर मे वायु तत्व के कमी के कारण संबन्धित अंगो का हलन-चलन, श्वसन, रक्त प्रवाह तथा शरीर मे गतिशील अंगो मे रोग होने की संभवना बढ़ जाती है। शरीर मे खिसाव ओर कंपन भी होने लगता है। भय ओर चिंता होने लगती है। शरीर मे फेफड़े, गुर्दे, हदय आदि अंग ज्यादा प्रभावी होता है ।

            प्राणायाम ओर डीप ब्रिधींग ओर सही ढंग से गहरा ओर लंबा श्वास लेने से वायु तत्व को संतुलित किया जा सकता है।

(5) आकाश – SKY 

NEEDS TO LIFE
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       हमारे शरीर मे आकाश तत्व भी मोजूत होता है । हमारे शरीर मे जो भी खाली जगह हे, वहा आकाश तत्व मोजूद होता है। शरीर मे आकाश तत्व की अधिकता वाले की सुनने की शक्ति अधिक सवेदनशील होती है। वह व्यक्ति हर बात को ध्यान से सुनता है। शरीर मे आकाश तत्व चारो तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, ओर वायु  को स्थान देता है। आँख, कान, नाक, जीभ, ओर स्पर्श के द्वारा जो कुछ  ग्रहण किया जाता है, उसकी प्रतिक्रीया स्वरूप जो कुछ होता है,  उसका सीधा सबंध आकाश तत्व से होता है।

            खुले आकाश मे उठने-बेठने, आकाश को निहार ने से, खुले आकाश के नीचे सोने ओर उपवास करने से इस आकाश तत्व को संतुलित किया जा सकता है। 

👉Relation of soul and body for health -आत्मा और शरीर का संबंध स्वास्थ्य के लिए 

👉 असयमित जीवन शैली – Uneven lifestyle

प्रेरणा – MOTIVATION

प्रेरणा के प्रकार – TYPE OF MOTIVATION 

1 आंतरिक प्रेरणा – intrinsic motivation

2 बाह्य प्रेरणा – Extrinsic motivation

 

NEEDS TO LIFE
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1 आंतरिक प्रेरणा :  आंतरिक प्रेरणा यह हमारे अंदर से उद्भव होने वाला भाव है । जब हम कुश काम करते हे तब यह भाव आंतरिक रूप से प्रकट होता हे , यह हमे खुशी देता है ताकि हम वो काम आसानी से कर सके । यह भाव तब उद्भव होता हे जब हम महत्व पूर्ण काम करते है । 

2 बाह्य प्रेरणा –  बाह्य प्रेरणा यह भाव हमे बाहर से उद्भव करवाया जाता है । उदाहरण के लिए कहु तो किसी विध्यार्थी को पहेले नंबर आने पर इनाम देना , ताकि वह उत्साह पूर्वक एक्जाम मे लिख सके। हम TV पर MOTIVATION VIDEO देखकर एक अच्छा काम करे । 

प्रेरणा क्यों जरूरी है ?-Why motivation is important?

हमारे जीवन मे MOTIVATION क्यों जरूरी है ? क्यों की MOTIVATION  से हमे उत्साह मिलता हे ताकि हम ओर हमारे साथी POSITIVELY काम कर सके । ओर MOTIVATION देकर हम दूसरों से काम करवा भी सकते है । MOTIVATION से हमे एक अलग प्रकारकी POSITIVE ENERGY मिलती है , उसे हम हमारा काम सफलता पूर्वक कर सकते है । ओर दुनिया के हर एक इंसान के सफलता के पिसे MOTIVATION होता है ।   
NEEDS TO LIFE
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प्रेरणा के फायदे -BENEFIT OF MOTIVATION 

  1. MOTIVATION से काम उत्साह के साथ होता है , ओर उसे हमारा काम बिना समय बिगड़े पूर्ण हो जाता है । 
  2. MOTIVATION एक दर्दी के इलाज के रूप मे काम करता है । 
  3. MOTIVATION हमे एक नई दिशा प्रदान करता है । 
  4. MOTIVATION से रुके हुए काम भी START हो जाते है । 
  5. MOTIVATION से हम समाज , देश , ओर दुनिया मे सुधार लासकते  है । 
  6. MOTIVATION हमारी अंदर की शक्ति को जागृत करता है । 
  7. MOTIVATION से हमे कोई भी लक्ष्य दूर नहीं लगता । 
  8. MOTIVATION से हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है । 
  9. MOTIVATION से हमारे जीवन मे सर्जनशीलता(CREATIVITY) आती है ।

अध्यात्मिकता क्या है ?- WHAT IS SPIRITUAL ?

           अध्यात्मिकता क्या है ?- WHAT IS SPIRITUAL ?

 आध्यात्मिक शब्द किसी धर्म के साथ जुड़ा हुआ नहीं है । अध्यात्मिक एक मन का भाव या अवस्था हे जो प्राप्त करने के बाद इंसान को इस पृथ्वी पर जीवन जीने के लिए किसी की सहायता की उमीद नहीं रहेती । वह स्वयं मे एक राजा होता है । अध्यात्मिकता जीवन मे सकारात्मकता ओर उत्साह लाने के लिए जरूरी है ।
HEALTHY SPIRITUAL LIFE
NEEDS TO LIFE

अध्यात्मिक व्यक्ति – SPIRITUAL PARSON 

अध्यात्मिक व्यक्ति हमेशा के लिए आनंद मे रेहता है । अध्यात्मिक व्यक्ति को किसी के (प्रीति,बंधन ,लगाव ) ATTACHMENT नहीं होता । अध्यात्मिक व्यक्ति किसी के साथ भेदभाव या उसनिस जेसी भावना नहीं रखता । वह हमेशा सबको एक जेसा ही समजता है । वह समभाव मे रहता है ।ओर यह सब वह गृहस्थ जीवन मे रहकर करता है । ना वह किसी धर्म से जुड़ा होता या ना किसी संप्रदाय से जुड़ा होता है। अध्यात्मिक होने के लिए एक गुणवान व्यक्ति होना जरूरी होता है । 
SPIRITUALITY HEALTH BENEFITS
NEEDS TO LIFE

अध्यात्मिकता के फायदे – BENEFIT OF SPIRITUALITY 

  1. अध्यात्मिक व्यक्ति कभी उदास नहीं होता, क्यो की वह हमेशा आनंद मे रहता है.। 
  2. उसको कभी गलत विचार नहीं आते , जेसे की शराब पीना, चोरी करना, किसी को परेशान करना, जुठ्ठ बोलना आदि । 
  3.  वह हमेशा दूसरों की सहायता करता है । 
  4. वह सबका आदर(Respect) करता है । 
  5. वह व्यक्ति हमेशा शांत रहता है । 
  6. वह तनाव(Tension) मे नहीं रहता । 
  7. वह अपने आसपास की नकारात्मकता को दूर करता है। 
  8. वह  मानसिक ओर शारीरिक स्वस्थ रहता है ।    

Relation of soul and body for health -आत्मा और शरीर का संबंध स्वास्थ्य के लिए

Relation of soul and body for health -आत्मा और शरीर का संबंध स्वास्थ्य के लिए 

 

Relation of soul and body for health

 

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   जैसा बताया गया है कि आत्मा (soul)और शरीर(body) अलग-अलग(different) है। जब तक दोनों साथ में होते हैं, तभी तक स्वास्थ्य(health) की समस्या (problem) होती है। दोनों के अलग होते ही शरीर की सारी गतिविधियाँ ( activities) स्वत: (self) समाप्त (finished) हो जाती हैं। शरीर की समस्त (all) गतिविधियों के संचालन (operation)करने वाली चेतना (प्राण) (Consciousness) और प्राण ऊर्झा (vitality energy) भी दोनों से अलग होती है, जिसका निर्माण(Construction) आत्मा(soul) और शरीर(body) के सहयोग(help) से होता है। बिना (without) आत्मा (soul) अथवा शरीर (body) प्राण ऊर्जा का अस्तित्व (existence) नहीं होता। प्राण और प्राण ऊर्जा को भी प्राय(Usually)जनसाधारण(Masses) एक ही समझते(Understand) हैं, परन्तु दोनों अलग-अलग    ( different) होते है । ऊर्जा तो जड़ (root) है, जबकि प्राण में चेतना होती है। गुब्बारे में हवा (air) भरने (Filling) से उसमें प्राण नहीं आ जाते और न हवा निकालने से गुब्बारे के प्राण चले जाते हैं। ऊर्जा शरीर में बाहर (out side) से भीतर (inside) आती है या शरीर में श्वसन की प्रक्रिया (process) से बनती है। जबकि प्राण शरीर में जन्म से विद्यमान होता है। प्राण अपने आप में शाश्वत (Perpetual) होता है, जबकि प्राण ऊर्जा को श्वास का आलम्बन (Dedication)आवश्यक(Required) होता है। इस लिए  प्राण कहें या चेतना (Consciousness), शरीर में आत्मा (soul) के ही  अंश (part) होते हैं तथा आत्मा शरीर में जिस शक्ति (power) से निश्चित (Fixed) आयुष्य (Life span) तक ठहरी (stay) हुई रहती है, उस शक्ति को प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है। उदाहरण (example) के लिए जैसे कोई व्यक्ति मोटर कार चला रहा है तो कार की तुलना (Comparison) तो शरीर से की जा सकती है और जो पेट्रोल के रूप में ईंघन (fuel) रूपी ऊर्जा इंजिन (engine) को बराबर मिलती रहती है उसकी तुलना प्राण ऊर्जा से | जो कार चालक (driver)  है, उसकी तुलना आत्मा से की जा सकती है । मतलब बिना चालक और पेट्रोल के कार नहीं चल सकती । वेसेही  उसी प्रकार बिना प्राण और प्राण ऊर्जा के जीवन(life) रूपी गाड़ी नहीं चल सकती । जिसमें प्राण होता है, वही प्राणवान  होता है । जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो, वेसे ही हम यही कहते हैं कि व्यक्ति के प्राण निकल गये । यह नहीं कहते कि प्राण ऊर्जा निकल गई । प्राण की उपस्थिति में ही जीव प्राणी  कहलाता है। प्राण हमारी आत्मा और स्थूल शरीर के बीच (between) सेतु (Bridge) का कार्य (work) करता है। आत्मा  और शरीर  का सारा संबंध(relation) प्राण के द्वारा(through) ही होता हैं।

Relation of soul and body for health

 

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 मानव जीवन में आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा (Diet, body, sense, breathing, language) और मन् (mind) के रूप में ऊर्जा के स्रोत माँ के गर्भ (Pregnancy) में आते ही मिल जाते हैं । आयुष्य प्राण के रूप में आत्मा के साथ किसो योनि में सीमित अवधि में रहने  की ऊर्जा प्राप्त होती है । श्वसन उस ऊर्जा के प्रवाह को संचालित और नियन्रित (Operated and controlled) करता है । जिस प्रकार पेट्रोल समाप्त होते ही कार रुक जाती है , उसी प्रकार आयुष्य प्राण के समाप्त होते ही जीवन का अन्त हो जाता है। जब तक आयुष्य प्राण रहता है तब तक आँख, नाक, कान, मुँह, स्पर्श (Eye, nose, ear, mouth, touch) आदि पांचों इन्द्रियाँ (Senses) और मन(mind) तथा वाणी (Voice) भी अपनी-अपनी प्राण ऊर्जाओं के अनुसार शरीर की गतिविधियों (activities) एवं प्रवृत्तियों (trends) के संचालन में सहयोग (help) देते हैं । जिस प्रकार बिजली से प्रकाश (Electric light), गमी , वाहन आदि उपकरणों के माध्यम ( medium) से अलग-अलग ऊर्जाए निर्मित है, उसके जेसे ही आयुष्य प्राण और श्वसन प्राण के सहयोग से आँख में देखने, कान यें सुनने (Listen), नाक में सुग्ध (Scented) लेने , जीभ (tongue) में बोलने, मुँह में अक्षर (food in mouth) करने, शरीर में स्पर्श ज्ञान की ऊर्जा उत्पन्न होती है। अगर हमारी कोई इच्द्रिव अथवा मन की प्राण ऊर्जा क्षीण (Weak) हो जाती है तो व्यवित की यह इन्द्रिय अथवा मन निष्क्रिय (Inactive) हो जाता है। वेसे  सभी इृन्द्रियाँ अपना कार्य बराबर करती  है, परनतु आयुष्य प्राण के बिगर जीवन एक क्षण (one moment) भी कहीं नहीं चल सकता।
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