शांति किसको नहीं साहिए ? सभी लोग अशांत हे, बेचेन हे, व्याकुल हे, दुखियारे हे। किसिकों इस बात का दुख हे, किसिकों दूसरी बात का दुख हे , आज एक बात का तो कल दूसरी बात का दुख । ईस तरह दुनिया के सभी लोग दुखी हे । ईस दुख दर्द से बहार केसे निकले ? ईस दुख से केसे छुटकारा पाए ? सही मायने मे सुख ओर शांति से केसे रह सकते हे ?हमारे देश के ऋषिओ, मुनियो, सद्गुरुओ, सत्पुरुषों, महापुरुषों, बुद्धो, अरहन्तोए सभीने ईस बात की शोध की, दुखो से छुटकारा केसे मिले ? सही मायने मे सुख शांति केसे प्राप्त हो ? साभिकों एक ही परिणाम मिला की धर्म से ही सुख शांति मिल सकती हे । सही सुख ओर शांति धर्म के बिना नहीं मिल सकती । किंतु धर्म तभी सुख ओर शांति प्रदान करता हे, जब हम उसको धारण करते हे । धर्म धारण करते नहीं ओर उसकी बाते करते हे ओर वाद–विवाद करे तो सुख ओर शांति नहीं मिलती । ईस लिए समजते हे की धर्म को केसे धारण करते हे ।
शांति किसको नहीं साहिए ? सभी लोग अशांत हे, बेचेन हे, व्याकुल हे, दुखियारे हे। किसिकों इस बात का दुख हे, किसिकों दूसरी बात का दुख हे , आज एक बात का तो कल दूसरी बात का दुख । ईस तरह दुनिया के सभी लोग दुखी हे । ईस दुख दर्द से बहार केसे निकले ? ईस दुख से केसे छुटकारा पाए ? सही मायने मे सुख ओर शांति से केसे रह सकते हे ?हमारे देश के ऋषिओ, मुनियो, सद्गुरुओ, सत्पुरुषों, महापुरुषों, बुद्धो, अरहन्तोए सभीने ईस बात की शोध की, दुखो से छुटकारा केसे मिले ? सही मायने मे सुख शांति केसे प्राप्त हो ? साभिकों एक ही परिणाम मिला की धर्म से ही सुख शांति मिल सकती हे । सही सुख ओर शांति धर्म के बिना नहीं मिल सकती । किंतु धर्म तभी सुख ओर शांति प्रदान करता हे, जब हम उसको धारण करते हे । धर्म धारण करते नहीं ओर उसकी बाते करते हे ओर वाद–विवाद करे तो सुख ओर शांति नहीं मिलती । ईस लिए समजते हे की धर्म को केसे धारण करते हे ।
आप समजते है धर्म क्या है ?-Do you understand what religion is?

देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य हे की पूरे देश मे “धर्म “के अर्थ को ही भूल गए हे। कहिभी धर्म– सबंधित बात–चर्चा होती हे तो लोगो के कान चुनने के लिए सतर्क हो जाते हे, की ए व्यक्ति किस धर्म की बात करेंगा ? हिन्दू धर्म या बोद्ध की , जैन धर्म या पारसी धर्म की , ईसाई धर्म या शिख धर्म की, किस धर्म की बात करेंगे ? बहुत बड़ा दुर्भाग्य हुआ हे की धर्म के साथ विशेषण लग गया हे । जाने की धर्म का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं हे ।
धर्म का उसका महान अस्तित्व हे, किंतु धर्म के साथ कोई भी विशेषण लग जाता हे तो धर्म “धर्म “ नहीं रहता । जिस दिन से धर्म के साथ हिन्दू लगने लगा तो हिन्दू प्रमुख होगया ओर धर्म अंधेरे मे चला गया । जिस दिन बोद्ध धर्म कहने लगे तब से ‘’बोद्ध’ मुख्य हो गया ओर धर्म गायब हो गया । जब से जैन धर्म कहने लगे तब से “जैन” बड़ा होगया ओर धर्म अदशय हो गया । धर्म को एसे विशेषण की जरूरत नहीं होती । धर्म कभी भी हिन्दू नहीं होता , बोद्ध, जैन, ईसाई, पारसी, मुस्लिम, के शीख नहीं होता । ए सभी लोगो के समूह हे , एक प्रकार के उत्सव बनाने वाले, व्रत- उपवास बनाने वाले , एक प्रकार की रहनी-करनी वाले, खान-पान वाले, दार्शनिक मान्यता वाले लोगो का समूह हे , संगठन हे, समुदाय हे, संप्रदाय हे। जैन , हिन्दू , पारसी , मुस्लिम , शीख ,ईसाई इत्यादि हो सकते हे , किंतु धर्म नहीं हो सकता । धर्म का इसके साथ दूर का कोई संमबंध नहीं हे। हम धर्म के नाम पर कहा भ्रमित हुए है ?
धर्म शब्द का सही मतलब ?-What does the word dharma mean?
भारतमे ढाई हजार साल पहले धर्म शब्द की परिभाषा थी “ धारेती ति धममों “ धारण करे वो धर्म । कोन धारण करेंगा ? तो समजाया की “अतनों पन सभान्व धारेती ति धममों “ अपना स्वभाव धारण करे, अपनी विशेषता धारण करे, इस मतलब को धर्म कहते है । हमारा दुर्भाग्य हुआ की , हमारे देश से एक बहुत बड़ा धर्म का साहित्य हमारे देश से अदशय हो गया । इस के कारण हम “धर्म” शब्द का सही मतलब ही भूल गए है । इसका परंपरिक इतिहास भूली गया , अपना स्वभाव धारण करे वो धर्म – भारत की यह प्राचीन व्याख्या को , यह परिभाषा को आज भी कभी–कभी , कही-कही प्रयोग हो जाता है ।
आज भी कहते है, अग्नि का धर्म जलना ओर जलाना हे , मतलब अग्नि का स्वभाव जलना ओर जलाना , वह स्वयं भी जलती हे ओर उसके लंपेंट मे जो भी आते हे उसको भी जलाती हे , तभी तो वह अग्नि है । यह जलता नहीं ओर जलाता नहीं तो वह कुस ओर हो सकता हे पर अग्नि नहीं । एसे कहेतों बरफ का धर्म ठंडा ओर ठंडा करना, यह इसका स्वभाव हे । इसमे हिन्दू , जैन ,ईसाई ,पारसी ,मुस्लिम ,शीख की कहा बात है ।
आज भी कहते हे सभी प्राणी मरणधर्मा हे । मरना इसका स्वभाव हे । जो भी प्राणी जन्म लेता हे वह मरने के लिए ही जन्म लेता है । सभी प्राणी जीर्णधर्मा – सभी प्राणी जीर्ण होते ही है । सभी प्राणी व्याधिधर्मा – सभी प्राणी को कुस न कुस रोग होई जाता है । यह स्वभाव हे,यह प्रकृति हे । भारत की प्राचीन भाषामे धर्म का यही मतलब होता है- यह स्वभाव हे, यह प्रकृति का नियम हे , कुदरत का कानून हे। यही दुनिया का विधान हे। इसे ऋत कहते हे। ऋत का मतलब कानून होता हे । यह एसा होगा तो यह परिणाम होंगे , यह वह नहीं होंग तो यह परिणाम नहीं आएगा । केसी वेज्ञानिक बाते हे! इस कही हिन्दू , मुस्लिम ,जैन , शीख ,पारसी की कही बात आई ? किंतु धर्म के बजाय संप्रदाय मे केसे भ्रमित हुए ! दार्शनिक मत-मतांतरों मे भ्रमित हुए , कर्मकांड मे भ्रमित हुए ओर एसे भ्रमित हुए की धर्म को भूल गए ।

हम अपने अंदर कोई भी विकार जगाते हे – क्रोध जगाते हे , द्वेष जगाते हे , दुर्भावना जगाते हे, इस लिए क्रोधका , द्वेषका ,ओर दुर्भावना का स्वभाव हे की हम व्याकुल बन जाते है । कोई भी क्रोध जगाके अनुभव कर ले वह तुरंत व्याकुल हो जाएगा । बाद मे भले ही वह स्वयं को हिन्दू कहे ,या बोद्ध , जैन , मुस्लिम ,यहूदी , ईसाई , शीख कहे उस कोई फरक नहीं पड़ता । यह धर्म हे। प्रकृतिका नियम हे , उसका स्वभाव हे । जब हम स्वयं अपने अंदर विकार जगाने लगते हे की प्रकृति हमे तुरंत दंड देना चालू कर देंगी । तुरंत सजा मिलना चालू हो जाता हे। कोई भी सही राज्ये के नियम बनते हे , वह सब लोग पर एक जैसे लागू होते है। पर जब एक जैसा नियम लागू नहीं होता तो वह सही राज्ये नहीं हो सकता । राज्ये के जो नियम तोड़ता हे तो राज्ये के तरफ से दंड मिलता है। किंतु एसा हो की राज्ये के कोई नियम तोड़े ओर राजयके अधिकारिओ पता ही ना चला तो अथवा अधिकारिओ ने देखा पर ध्यान नहीं दिया ओर कोई कार्यवाही नहीं की तो दंड नहीं मिलेगा । किंतु कुदरत के राज्य मे , प्रकृति के राज्य मे अन्यथा एसा कहो परमात्मा के राज्य मे एसा नहीं चलेगा । यहा तो कोई नियम तोड़ेंगा तो दंड नहीं मिलेंगा एसा तो असंभव है।
जोभी क्षण आप नियम तोड़ेगे तो वह तत्काल दंड को प्राप्त करेगा । जोभी क्षण मन मे विकार जगाएगे , तुरंत आप परेसान होना चालू हो जाएंगे, इसमे देर नहीं लगेगी । प्राचीन भाषा मे इसको सहजात कहा हे, मतलब एकसाथ जन्म होना । हमारे विकार ओर दुख का एक साथ जन्म होता है। मनमे विकार जगा तुरंत व्याकुल हुआ । मनमे विकार जगा ओर सुख-शांति का अनुभव हो , यह असंभव है। यह दोनों साथ मे नहीं हो सकता । विकार जगा ओर तुरंत व्याकुल हुआ क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। जो नियम तोड़ेंगा उसको दंड भुगतना ही पड़ेगा । यह ए नाम से बुलाए या वह नाम से बुलाए, इसको प्रकृति नहीं देखती की, वह व्यक्ति अपने को किस नाम से बुलाता है।स्वयं को हिन्दू कहे या बोद्ध कहे, ब्राह्मण कहे या क्षत्रिय कहे , अथवा शैव कहे या वैष्णव कहे । प्रकृति यह नहीं देखती की यह भारतीय हे या अमेरिकन ,जापानी हे या चीनी , दंड तो तुरंत मिलेगा , प्रकृति का यह नियम हे, यह धर्म है।
इसी तरह अपने विकारो को शून्य करदे , मतलब अपने मन को विकार विहीन निर्मल चित स्वयम का स्वभाव है। इसमे अनंत मैत्री भर जाएगी, अनंत करुणा भर जाएगी , अनंत समता भाव से भर जाएगी । यह इसका स्वभाव हे , यह प्रकृति हे, यह नियम हे , यह ऋत हे। ओर जेसे ही मैत्री जागेगी करुणा जागेगी सदभावना जागेगी , तुरंत आपको पुरुस्कार देना चालू हो जाएगा । आपको अंदर से शांति का अनुभव होगा, ओर बहुत सुख का अनुभव होगा । अब आप अपने आपको हिन्दू ,जैन ,बोद्ध ,मुस्लिम, पारसी , अमेरिकन ,रशियन कुस भी फरक नहीं पड़ता । पुरुस्कार मिलना चालू हो जाएगा । जरसा चित को निर्मल करके तो देखो मैत्री भाव जगा के तो देखो , करुणा भाव जगा के तो देखो , सदभावना जगा के तो देखो , तुरंत परिणाम मिलना चालू हो जाएगा , देर नहीं लगेगी । जेसे दंड मिलने मे देर नहीं लगती , वेसे ही पुरुस्कार मिलने मे देर नहीं लगती । प्राचीन भारत मे इसको धर्म कहे ते थे ।
